नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को साफ किया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और राज्य बार काउंसिलों के पास लॉ के छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि छात्रों पर ऐसा नियंत्रण उनके वकील के रूप में पंजीकृत होने के बाद ही शुरू होता है.

इस मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने की. यह पीठ मिहिरा सूद और अभिषेक तिवारी द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी. इस याचिका में बीसीआई अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा द्वारा 13 अगस्त को जारी निर्देशों को चुनौती दी गई थी. हालांकि, बीसीआई अध्यक्ष ने कुछ ही घंटों के भीतर इन निर्देशों को वापस ले लिया था.

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने तर्क दिया कि भले ही अध्यक्ष के निर्देश वापस ले लिए गए हों, लेकिन जिस तरह से इन्हें जारी किया गया था, उस तरीके की जांच होनी चाहिए. वकील ने कहा कि यह एक विश्वविद्यालय में बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला है और यह सिर्फ एक छात्र से जुड़ा मुद्दा नहीं है.

वहीं, बीसीआई अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता मनन कुमार मिश्रा ने अदालत को बताया कि इन निर्देशों को जारी होने के एक घंटे के भीतर ही वापस ले लिया गया था. हालांकि, परमेश्वर ने दलील दी कि बीसीआई अब कह रहा है कि पत्र वापस ले लिए गए हैं, लेकिन यह असल मुद्दा नहीं है. उन्होंने ध्यान दिलाया कि बीसीआई ने शुरुआत में कहा था कि छात्रों के पूरे बैच को वकील के रूप में पंजीकृत नहीं किया जाएगा.

उन्होंने कहा कि उनके मुवक्किल बीसीआई से यह जानना चाहते हैं कि ये बैठकें कैसे आयोजित की गईं, यह निर्णय किसने लिया और कानून के किस प्रावधान के तहत ऐसा किया गया. वरिष्ठ वकील ने इस बात पर बल दिया कि लॉ के छात्रों पर बीसीआई का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है, और वह केवल उनके वकील के रूप में पंजीकृत होने के बाद ही उनके आचरण को नियंत्रित कर सकती है.

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "हमारा यह मानना है कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961, जिसके तहत बीसीआई (BCI) का कानूनी रूप से गठन किया गया है, बीसीआई या किसी भी राज्य बार काउंसिल को लॉ के छात्रों के खिलाफ कोई भी अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष अधिकार नहीं देता है. इस तरह का अधिकार किसी लॉ ग्रेजुएट के उक्त अधिनियम के तहत वकील के रूप में पंजीकृत होने के बाद ही मिलता है. जहां तक छात्रों का सवाल है, केवल उनका मूल संस्थान या उस संस्थान के नियमों/उप-नियमों के तहत तय की गई अथॉरिटी ही अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के लिए सक्षम है..."

पीठ ने सुनवाई का समापन करते हुए कहा, "हम 13 अगस्त के सभी पत्रों या उसके बाद के संशोधित पत्रों को बिना किसी कानूनी अधिकार के (अवैध) घोषित करते हैं. अंतरिम निर्देशों को अंतिम माना जाए."

13 अगस्त को बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा के उस पुराने आदेश में बदलाव किया था, जिसने राज्य बार काउंसिलों को नालसार (NALSAR) यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 2026 के ग्रेजुएट्स को वकील के रूप में पंजीकृत करने से रोक दिया था.

बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने यह बदलाव यह पाए जाने के बाद किया कि ज्यादातर छात्र निर्दोष थे और विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की हिस्सेदारी का विरोध करने वाले अभियान में शामिल नहीं होना चाहते थे.

इससे पहले दिन में, बीसीआई ने सभी राज्य बार काउंसिलों को अगले आदेश तक नालसार (NALSAR) यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, हैदराबाद के 2026 बैच के ग्रेजुएट्स को वकील के रूप में पंजीकृत करने पर रोक लगाने का निर्देश दिया था. यह निर्देश उस छात्र अभियान की जांच के दौरान दिया गया था, जिसने विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के शामिल होने का विरोध किया था.

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Contributor at National Media Alliance

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